सोयाबीन की उन्नत खेती
सोयाबीन भारतवर्ष में महत्वपूर्ण फसल है | इसको भटमास, भटवार, रामकुल्थी तथ गरिकालिया नाम से भी जाना जाता है । हमारे देश में सोयाबीन की खेती कुमाँयू, गढ़वाल तथा मध्य भारत में प्राचीनकाल से होती आयी है, इन दिनों काले दाने की नागपुर की सोयाबीन काफी प्रसिद्ध प्रजातियों में से एक है, इसे कालीतूर के नाम से भी पुकारा जाता है ।

सोयाबीन न केवल प्रोटीन का एक उत्कृष्ट स्रोत है, बल्कि यह कई शारीरिक क्रियाओं को भी प्रभावित करता है । आधुनिक शोध में पाया गया है कि सोया प्रोटीन मानव रक्त में कोलेस्ट्रोल की मात्रा कम करने में सहायक होता है । शायद यही वजह है कि सोयाबीन का उत्पादन 1985 से लगातार बढ़ता जा रहा है और सोयाबीन के तेल की खपत मूँगफली एवं सरसों के तेल के पश्चात सबसे अधिक होने लगा है ।

यों तो सोयाबीन दाल की तरह ही है, किन्तु इससे दूध, दही, पनीर बनाने की परम्परा बहुत अधिक प्रचलित हो रही है, इसमें सोयाबीन की विषमुक्त खेती किसानो के लिए वरदान साबित हो रही है । इसकी उपयोगिता को ध्यान में रखकर इजराईल तथा कोलम्बिया सरकार ने चपाती के अन्दर 5 प्रतिशत सोया आटा मिलाना कानूनन अनिवार्य कर दिया है ।

सोयाबीन की फसल के लिए उपयुक्त जलवायु 
सोयाबीन फसल के लिए शुष्क गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है, इसके बीजों का जमाव 25 डी०से० पर 4 दिन में हो जाता है, जबकि इससे कम तापमान होने पर बीजों के जमाव में 8 से 10 दिन लगता है । अत: सोयाबीन खेती के लिए 60-65 सेमी. वर्षा वाले स्थान उपयुत्त माने गये हैं ।

इस फसल की खेती पहाडी क्षेत्रों में भी काफी लोकप्रिय एवं सफल है ।

सोयाबीन की फसल के लिए भूमि चयन एवं खेत की तैयारी 
सोयाबीन की खेती के लिए उचित जल-निकास वाली दोमट भूमि सबसे अच्छी रहती है । पर अम्लीय, क्षारीय अथवा खारे पानी वाली भूमि कतई अनुकूल नहीं होती । पतंजलि विषमुक्त कृषि विमाग ने अपने शोध में पाया कि पानी के उच्च स्तर वाली भूमि में फाइटोफ्बोरा कवक रोग का प्रकोप हो जाता है, अत: ऐसी भूमि पर सोयाबीन की खेती से बचना चाहिए ।

सोयाबीन की खेती के लिए भूमि की तैयारी करते समय भूमि में जैविक कार्बनिक पदार्थो का प्रतिशत ज्यादा से ज्यादा हो । इसके लिए खेत में हरी खाद फसल लेकर, तदोपरान्त सोयाबीन की बुवाई करना लाभप्रद रहता है ।

खेत तैयारी करते समय 2 बार हैरो या मिट्‌टी पलट हल से जुताई करने के उपरान्त देशी हल से जुताई कर पाटा लगाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए, तदोपरान्त पलेवा (सिंचाई) करते समय 1000 लीटर ‘पतंजलि संजीवक खाद’ प्रति एकड़ की दर से डालें । पलेवा के 6- 7 दिन पश्चात खेत की पुन: देशी हल से जुताई कर देनी चाहिए, इसके पश्चात ही बीज बुवाई करनी चाहिए ।

बीज बुवाई
सोयाबीन के बीज की मात्रा भूमि में उपस्थित नमी, बुवाई समय, बीज की किस्म पर निर्भर करती हैं । पतंजलि विषमुत्त कृषि विमाग 25 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ बुवाई हेतु संस्तुति करता है । इसकी बुवाई सीडड्रिल या हल द्वारा कतारों में की जाती है । बीज की बुवाई 3-4 सेमी. गहरी तथा बीज से बीज की दूरी 30 सेमी. तक रखनी चाहिए।

पतंजलि विषमुक्त कृषि विभाग द्वारा सोयाबीन अंकुर, दुर्गा, अंलकार, पी.के.262 एवं पी.के.327 किस्में संस्तुत की जाती हैं ।

विशेष यह कि ‘पतंजलि में हुये परीक्षणों के अनुसार सोयाबीन में मक्का की मिश्रित खेती से सबसे अधिक उपज प्राप्त की गई है | अतः मक्का एंव सोयाबीन की एक साथ फसल लेना अधिक लाभप्रद है |

सोयाबीन फसल में कुदरती खाद
सोयाबीन फसल की उचित वृद्धि एवं विकास के लिए कुदरती संजीवक खाद एवं बायोगैस स्लरी बहुत जरुरी है । इसके प्रयोग से पौधों की वृद्धि अच्छी होने के अतिरिक्त पैदावार भी अधिक होती है ।

प्रथम बार फसल में 1500 लीटर पतंजलि संजीवक खाद अथवा बायोगैस स्लरी प्रति एकड़ प्रथम सिंचाई के समय अवश्य देनी चाहिए ।

दूसरी बार 1000 लीटर ‘पतंजलि संजीवक खाद’ अथवा ‘बायोगैस स्लरी खाद’ प्रति एकड़ की दर से उस समय फसल के देना चाहिए, जब सोयाबीन पौधों पर फ्लोवारिंग प्रारम्भ हो जाये ।

सिंचाई एवं खरपतवार नियंत्रण
पौधों के जमने के पश्चात सोयाबीन के पौधों को अधिक पानी से नुक्सान नहीं होता, क्योंकि इनके पौधों की जड़ों में एरेनकाइका ऊतक बन जाते हैं, जो जड़ों को हवा प्रदान करते हैं । फलस्वरूप उनकी श्वसन व अन्य क्रियाएं आवश्यकतानुसार होती रहती हैं, लेकिन फूल आने से 2 सप्ताह पूर्व सिंचाई अवश्य करनी चाहिए, जिससे पौधों पर फलियाँ अधिक से अधिक लगा सकें ।

वैसे सोयाबीन की फसलों को खरपतवारों से विशेष हानि होने की सम्भावना रहती है, क्योंकि वर्षा की अनियमिता के कारण समय पर निराई-गुडाई नहीं हो पाती है और खरपतवार पनपते रहते हैं ।

खरपतवार फसल के साथ प्रकाश, नमी, खाद्य पदार्थो के संदर्भ में स्पर्धा करते हैं । अत: सोयाबीन फसल की बीजाई के 20-25 दिन बाद पहली निराई-गुडाई करने से खरपतवारों की संभावित रोकथाम हो जाती है ।

सोयाबीन फसल सुरक्षा
बिहार की रोमिल सूण्डी
यह पीले या भूरे रंग की रोयेंदार सूण्डी होती है, जो अधिकतर झुण्डों में रहती है | यह सोयाबीन के पौधों की पत्तियों को खाकर छलनी कर देती है | यह प्रारम्भ में खरपतवारों पर ही आश्रय लेती है, अत: खेत में खरपतवार नहीं उगने देना चाहिए | इस सूण्डी से सोयाबीन फसल को बचाने हेतु पतंजलि विधि से निर्मित ‘करंजादि’ कीट रक्षक अत्यन्त प्रभावी हैं । 5 लीटर ‘करंजादि कीट रक्षक’ को 40 लीटर पानी में मिलाकर सप्ताह में  2 बार छिड़काव करने से सूण्डी खत्म हो जाती है |

सोयाबीन का तना बेधक कीट 
इसका प्रकोप पौधों के जमाव के साथ ही आरम्भ हो जाता है । यह कीड़ा पत्तियों को खाना आरम्भ करता है, तदोपरान्त 2 दिन बाद तने के नीचे छेद करके अन्दर से खाकर पौधे को हानि पहुँचाता है |

रोगों से सोयाबीन की फसल का बचाव
इस रोग से सोयाबीन की फसल को सुरक्षित रखने के लिए पतंजलि बायो रिसर्च इंस्टिट्यूट का अभिमन्यु एवं पतंजलि नीम्बादि कीट रक्षक दोनों को मिलाकर छिड़काव करना चाहिए । 5 लीटर नीम्बादि में 100 मिली अभिमन्यु तथा 40 लीटर पानी मिलाकर फसल में 2 बार छिड़काव प्रति माह करते रहना आवश्यक है ।

सोयाबीन की सफेद मक्खी
यह मक्खी सोयाबीन के पौधों में विषाणु रोग (पीला मोजैक) के लिए वेक्टर का कार्य करती है तथा पत्तियों का रस चूसती है, इससे फसल की उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।

सोयाबीन की सफेद मक्खी से बचाव
प्रभावित पौधों पर सप्ताह में 2 बार ‘हींगादि कुदरती कीट रक्षक’ का छिड़काव करते रहना चाहिए, इसके छिड़काव के उपरान्त फसल पर राख अवश्य छिड़क देनी चाहिए ।

फसल कटाई एवं गहाई
सोयाबीन फसल में जब पत्तियों का रंग पीला पड़ जाये और पत्तियां सूखकर गिरनी प्रारम्भ हो जाये, इस अवस्था पर फसल कटाई कर लेनी चाहिए । फसल कटाई के बाद सूखने के लिए फसल को छोड़ दें और 4-5 दिन पश्चात मशीन की सहायता से दाना अलग कर लें ।

उपरोक्त विधि से सोयाबीन की खेती करने पर 16 क्विंटल सोयाबीन दाना तथा 25 क्विंटल सूखा भूसा हमारे कृषक भाई साधारण ढंग से प्राप्त कर सकते हैं । अत: आप भी पतंजलि विधि अपनायें और सोयाबीन का भरपूर उत्पाद पायें ।


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